भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता भारत और यूरोप के बीच आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक रिश्तों में एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। लगभग दो दशकों तक चली लंबी बातचीत के बाद अब यह मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement – FTA) अपने अंतिम चरण में है। इसे सरकार और नीति-विशेषज्ञ “मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील” कह
रहे हैं, क्योंकि इसका दायरा, प्रभाव और आर्थिक महत्व अब तक भारत द्वारा किए गए किसी भी व्यापार समझौते से कहीं बड़ा है।यह समझौता भारत को यूरोपीय संघ के 27 विकसित देशों के विशाल और समृद्ध बाजार तक सीधी पहुंच देगा। इससे न केवल भारतीय निर्यात को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि विदेशी निवेश, रोजगार सृजन और तकनीकी सहयोग के नए अवसर भी पैदा होंगे।
भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता

क्यों कहा जा रहा है इसे ‘मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील’?
इस भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते को इतना खास इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यह एक साथ 27 देशों को कवर करता है। आमतौर पर भारत अलग-अलग देशों या छोटे समूहों के साथ एफटीए करता है, लेकिन यूरोपीय संघ दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक ब्लॉकों में से एक है।वित्त वर्ष 2024–25 के आंकड़ों के अनुसार, भारत और यूरोपीय संघ के बीच कुल व्यापार लगभग 135 बिलियन डॉलर का है। इसमें भारत का निर्यात करीब 75 बिलियन डॉलर और आयात लगभग 60
बिलियन डॉलर रहा, जिससे भारत को लगभग 15 बिलियन डॉलर का व्यापार अधिशेष प्राप्त हुआ।यदि इस समझौते के तहत टैरिफ घटते या पूरी तरह समाप्त होते हैं, तो भारतीय उत्पाद यूरोपीय बाजार में और अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। इसका सीधा लाभ कपड़ा, फार्मा, आईटी, ऑटो कंपोनेंट्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मिलेगा। खासतौर पर कपड़ा उद्योग के लिए यह समझौता बेहद अहम है, क्योंकि बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देश पहले से ही यूरोप में टैरिफ-फ्री एक्सेस का फायदा उठा रहे
ब्रेक्जिट का प्रभाव: जिसने बातचीत को तेज किया
इस समझौते को आगे बढ़ाने में एक अप्रत्याशित लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका ब्रेक्जिट ने निभाई। यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के बाद यूनाइटेड किंगडम (UK) ने भारत के साथ अलग से व्यापार समझौता कर लिया।इससे यूरोपीय संघ के भीतर चिंता पैदा हुई कि यदि भारत के साथ समझौता जल्दी नहीं किया गया, तो यूके भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त हासिल कर
सकता है। यही डर यूरोपीय संघ को भारत के साथ बातचीत में ज्यादा लचीला बनने के लिए प्रेरित करता है।एक तरह से देखा जाए तो यूके और यूरोपीय संघ के बीच प्रतिस्पर्धा भारत के लिए फायदेमंद साबित हुई और वर्षों से रुकी हुई वार्ता को निर्णायक मोड़ मिला।

भारत के निर्यात की छिपी ताकत: रूसी तेल और रिफाइंड उत्पाद
यूरोपीय संघ को भारत के निर्यात में एक दिलचस्प और कम चर्चित तथ्य रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों से जुड़ा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस से सीधे तेल खरीदना कम कर दिया, तब भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदकर उसे अपनी रिफाइनरियों में प्रोसेस किया और फिर तैयार उत्पादों को यूरोप को निर्यात किया।इस रणनीति ने भारत के व्यापार संतुलन को पूरी तरह बदल दिया। 2022 के बाद भारत का यूरोपीय संघ के साथ व्यापार घाटा, एक मजबूत व्यापार अधिशेष में तब्दील हो गया। यह भारत की ऊर्जा कूटनीति और आर्थिक व्यावहारिकता का एक बेहतरीन उदाहरण माना जा रहा है।
21 साल क्यों लगे? विवादित मुद्दों की लंबी सूची
इस भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में 21 साल लगने का मुख्य कारण कुछ जटिल और संवेदनशील मुद्दे रहे हैं, जिन पर दोनों पक्षों की राय अलग-अलग थी:• उच्च आयात शुल्क: यूरोपीय संघ चाहता था कि भारत शराब, वाइन और जर्मन लक्जरी कारों (BMW, Audi, Mercedes) पर लगाए जाने वाले 150% तक के आयात शुल्क को कम करे। भारत इसे अपने घरेलू उद्योग के लिए खतरा मानता रहा।• डेटा सुरक्षा नियम: यूरोपीय संघ के सख्त डेटा प्रोटेक्शन कानूनों के
तहत भारतीय आईटी कंपनियों को यूरोप में डेटा सेंटर स्थापित करने की आवश्यकता होती है, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है।• बौद्धिक संपदा अधिकार: यूरोपीय कंपनियां भारत के जेनेरिक दवा उद्योग को लेकर चिंतित रही हैं, जिसे वे अपनी
रिसर्च आधारित दवाओं की नकल मानती हैं।• वीज़ा और पेशेवर आवाजाही: यूरोपीय संघ के कड़े वीजा नियम भारतीय इंजीनियरों, आईटी प्रोफेशनल्स और डॉक्टरों के लिए बड़ी बाधा रहे हैं।हालांकि, अब तक 24 में से 20 अध्यायों पर सहमति बन चुकी है और बाकी संवेदनशील मुद्दों को चरणबद्ध तरीके से सुलझाने पर सहमति बनी है।

अगली बड़ी चुनौती: यूरोप का कार्बन बॉर्डर टैक्स
भविष्य में इस समझौते के सामने सबसे बड़ी चुनौती यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर टैक्स हो सकता है, जिसे 1 जनवरी 2026 से लागू करने की योजना है। यह टैक्स उन उत्पादों पर लगाया जाएगा जिनका उत्पादन अधिक कार्बन उत्सर्जन के साथ किया जाता है।भारतीय स्टील, सीमेंट और एल्यूमिनियम उद्योग, जो मुख्य रूप से कोयले पर आधारित हैं, इस टैक्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। यदि इस मुद्दे पर संतुलित समाधान नहीं निकाला गया, तो यह भारत के निर्यात को नुकसान पहुंचा सकता है।
अवसर विशाल हैं, चुनौतियाँ भी
कुल मिलाकर, भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता भारत के लिए आर्थिक विकास, निर्यात विस्तार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत भूमिका निभाने का एक ऐतिहासिक अवसर है। कपड़ा, फार्मा, आईटी, मैन्युफैक्चरिंग और ऑटो सेक्टर को इससे विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है।थिंक टैंक GTRI के अनुसार, इस समझौते से द्विपक्षीय व्यापार में लगभग 30% की
वृद्धि हो सकती है और 2030 तक भारत का कपड़ा निर्यात 50 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। इसके अलावा, यह
समझौता भारत की China+1 रणनीति को मजबूती देगा और भारत को यूरोपीय कंपनियों के लिए एक भरोसेमंद निवेश गंतव्य बनाएगा।हालांकि, कार्बन टैक्स, डेटा सुरक्षा और बौद्धिक संपदा जैसे मुद्दे भविष्य में चुनौती बने रहेंगे। अब असली
परीक्षा यह होगी कि क्या यह ‘मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील’ भारत को एक विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य के और करीब ला पाएगी।