अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा तनाव इस समय दक्षिण एशिया की भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील और विस्फोटक मुद्दा बन चुका है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच दशकों से चली आ रही अविश्वास की खाई अब खुली सैन्य झड़पों, हवाई हमलों और सीमा पार आरोप-प्रत्यारोप में बदलती दिख रही है। जो विवाद कभी कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित था, वह अब वास्तविक गोलाबारी और सैन्य तैयारियों के रूप में सामने आ रहा है।
यह केवल एक पारंपरिक सीमा विवाद नहीं है; यह संप्रभुता, आतंकवाद, क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा जटिल संघर्ष है। इस लेख में हम उन पाँच बड़ी बातों का विश्लेषण करेंगे, जो इस संकट को और भी गंभीर बनाती हैं।

अमेरिकी वापसी के बाद बदला शक्ति संतुलन
जब NATO और विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका ने 2021 में अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुलाई, तो इससे पूरे क्षेत्र का सामरिक समीकरण बदल गया। लगभग दो दशकों तक विदेशी सैन्य उपस्थिति ने शक्ति संतुलन को एक विशेष ढांचे में बांध रखा था।अमेरिकी वापसी के बाद अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन हुआ और अब वहां की नई व्यवस्था खुद को अधिक संगठित और
आत्मनिर्भर सैन्य ढांचे के रूप में प्रस्तुत कर रही है। अमेरिकी सेना द्वारा छोड़े गए हथियारों और सैन्य उपकरणों ने अफगान पक्ष को संसाधनों के लिहाज से मजबूत किया है।अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा तनाव के संदर्भ में यह बदलाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब पाकिस्तान के सामने एक ऐसा पड़ोसी है जो पहले की तुलना में अधिक आत्मविश्वासी और सैन्य रूप से सक्षम दिखाई देता है। यह बदला हुआ संतुलन सीमा पर छोटे घटनाक्रमों को भी बड़े टकराव में बदल सकता है।
डूरंड रेखा—विवाद की ऐतिहासिक जड़
इस पूरे संकट की ऐतिहासिक जड़ डूरंड रेखा में छिपी है। 1893 में ब्रिटिश भारत और अफगान अमीर के बीच खींची गई यह रेखा आज भी विवाद का केंद्र है। पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है, जबकि अफगानिस्तान का एक बड़ा वर्ग इसे औपनिवेशिक विरासत मानकर अस्वीकार करता है।जब सीमा की वैधता पर ही सहमति नहीं हो, तो बाड़ लगाना, चौकी बनाना या सैन्य गश्त करना भी दूसरे पक्ष को उकसावे जैसा प्रतीत होता है। पाकिस्तान का तर्क है कि वह अपनी सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी अभियानों के
लिए सीमा प्रबंधन कर रहा है। दूसरी ओर, अफगानिस्तान इसे अपनी संप्रभुता पर हस्तक्षेप मानता है।यही बुनियादी असहमति अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा तनाव को बार-बार भड़काती है। इतिहास की यह विरासत आज भी वर्तमान की राजनीति को दिशा दे रही है।

आतंकवाद, गैर-राज्य तत्व और आरोपों की राजनीति
पाकिस्तान लंबे समय से दावा करता रहा है कि सीमा पार से सक्रिय उग्रवादी समूह उसकी सुरक्षा के लिए खतरा हैं। वहीं अफगान पक्ष आरोप लगाता है कि पाकिस्तान उसकी आंतरिक राजनीति और सुरक्षा मामलों में दखल देता है।इस परिदृश्य में “गैर-राज्य तत्व” (Non-state actors) एक केंद्रीय मुद्दा बन जाते हैं। जब भी पाकिस्तान के भीतर कोई बड़ा हमला होता है, तो उसके तार सीमा पार से जुड़े होने का दावा किया जाता है। इसके जवाब में की गई सैन्य कार्रवाई अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा तनाव को और भड़का देती है।यह स्थिति एक दुष्चक्र (vicious cycle) पैदा करती है—हमला, आरोप, जवाबी कार्रवाई और फिर प्रतिशोध की धमकी। इस चक्र में कूटनीति अक्सर पीछे छूट जाती है।
सूचना युद्ध और राष्ट्रवादी नैरेटिव
आधुनिक संघर्ष केवल जमीन पर नहीं, बल्कि डिजिटल मंचों पर भी लड़ा जाता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किए जा रहे वीडियो, तस्वीरें और दावे जनता की भावनाओं को भड़काने का काम करते हैं।दोनों देशों के समर्थक समूह अपने-अपने दावों को सही साबित करने के लिए “सूचना युद्ध” (Information Warfare) का सहारा लेते हैं। पकड़ी गई चौकियों, नष्ट किए गए ठिकानों
और हवाई हमलों के वीडियो तेजी से वायरल होते हैं।इस माहौल में तथ्य और प्रचार के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा तनाव केवल सैन्य या राजनीतिक मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि यह जनभावनाओं और राष्ट्रवादी गर्जना का हिस्सा बन जाता है। जब जनता भावनात्मक रूप से उग्र हो, तो सरकारों के लिए समझौता करना और भी कठिन हो जाता है।

मानवीय और आर्थिक असर—सबसे बड़ी कीमत कौन चुका रहा है?
सीमा पर रहने वाले आम नागरिक इस तनाव की सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं। गोलाबारी के कारण गांव खाली होते हैं, व्यापारिक मार्ग बंद हो जाते हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था ठप पड़ जाती है।अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा पार व्यापार हजारों परिवारों की आजीविका से जुड़ा है। जब अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा तनाव बढ़ता है, तो ट्रक खड़े रह जाते हैं, आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं।मानवीय दृष्टिकोण से देखें तो यह केवल भू-राजनीतिक खेल नहीं है; यह बच्चों की शिक्षा, परिवारों की सुरक्षा और रोज़ी-रोटी का सवाल है। राष्ट्रवाद और रणनीति की बहसों के बीच आम इंसान की आवाज अक्सर दब जाती है।
क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव
इस तनाव का असर केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं है। दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन, मध्य एशिया से व्यापार मार्ग, और आतंकवाद विरोधी वैश्विक रणनीतियां—सब पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।यदि अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा तनाव और बढ़ता है, तो यह पड़ोसी देशों और वैश्विक शक्तियों को भी अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है। क्षेत्रीय अस्थिरता निवेश, विकास परियोजनाओं और सुरक्षा सहयोग पर नकारात्मक असर डाल सकती है।
क्या युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं दोनों देश?
वर्तमान संकेत चिंताजनक जरूर हैं—सीमा पर सैनिकों की तैनाती, हवाई गतिविधियां और सख्त बयानबाजी। लेकिन अभी भी संवाद की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।इतिहास गवाह है कि कई बार गंभीर दिखने वाले संकट कूटनीतिक वार्ता से हल हुए हैं। हालांकि, इसके लिए दोनों पक्षों को राष्ट्रवादी दबाव से ऊपर उठकर दीर्घकालिक शांति को प्राथमिकता देनी होगी।अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा तनाव का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या दोनों देश अपने ऐतिहासिक विवादों को शांतिपूर्ण वार्ता के जरिए सुलझाने की इच्छाशक्ति दिखाते हैं या नहीं।
धुंध के पार की राह
डूरंड रेखा का विवाद, आतंकवाद के आरोप, सूचना युद्ध और राष्ट्रवादी राजनीति—ये सभी कारक मिलकर इस संकट को जटिल बनाते हैं। फिर भी, हर संकट अपने भीतर समाधान की संभावना भी छिपाए रहता है।यदि संवाद, पारदर्शिता और आपसी विश्वास बहाली के कदम उठाए जाएं, तो अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा तनाव को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन यदि बयानबाजी और बदले की राजनीति हावी रही, तो यह तनाव बड़े संघर्ष में बदल सकता है—ऐसे संघर्ष में जिसका कोई वास्तविक विजेता नहीं होगा।आखिरकार, नक्शों पर खींची गई लकीरों से ज्यादा महत्वपूर्ण वहां रहने वाले लोग हैं। शांति ही वह विकल्प है, जो दक्षिण एशिया के स्थिर और सुरक्षित भविष्य की कुंजी बन सकता है।