ईरान हमले पर कीर स्टार्मर का ट्रंप को इनकार, क्या टूटेगा विशेष संबंध?

ईरान हमले पर कीर स्टार्मर का ट्रंप को इनकार

ईरान हमले पर कीर स्टार्मर का ट्रंप को इनकार, क्या टूटेगा विशेष संबंध?दुनिया की सबसे मजबूत दोस्ती में क्या दरार पड़ गई है?जब डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर संभावित हमले के संकेत दिए, तो उन्हें भरोसा था कि ब्रिटेन हमेशा की तरह कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा

होगा। लेकिन इस बार कहानी बदल गई।कीर स्टार्मर ने ऐसा ‘नो’ कहा जिसने वॉशिंगटन की रणनीति को हिला कर रख दिया। यह सिर्फ सैन्य इनकार नहीं था—यह था एक राजनीतिक संदेश।सवाल अब बड़ा है: क्या ईरान संकट ने अमेरिका-ब्रिटेन के ‘विशेष संबंध’ की नींव हिला दी है? और क्या ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर अकेला कर रही है?

दरकता हुआ ‘विशेष संबंध’ और कूटनीतिक भूचाल

ईरान हमले पर कीर स्टार्मर का ट्रंप को इनकार दरकता हुआ ‘विशेष संबंध’ और कूटनीतिक भूचालदशकों से ‘विशेष संबंध’ (Special Relationship) वैश्विक भू-राजनीति का एक ध्रुव रहा है, जहाँ वाशिंगटन और लंदन एक-दूसरे के पूरक बने रहे। लेकिन आज, ईरान के विरुद्ध संभावित सैन्य कार्रवाई ने इस ऐतिहासिक गठबंधन की बुनियाद हिला दी है। जब डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले के संकेत दिए, तो उन्हें अपने सबसे पुराने सहयोगी

से वह समर्थन नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का कड़ा रुख न केवल एक सैन्य निर्णय है, बल्कि यह एक उभरते हुए ‘भू-राजनीतिक गतिरोध’ (Geopolitical Deadlock) का संकेत है, जहाँ ब्रिटेन अब अपनी ‘सामरिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) को सर्वोपरि रख रहा है।

ईरान हमले पर कीर स्टार्मर का ट्रंप को इनकार

कीर स्टार्मर का इनकार और घरेलू राजनीति का गणित

कीर स्टार्मर का इनकार और घरेलू राजनीति का गणितब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने स्पष्ट कर दिया है कि वे ईरान के विरुद्ध किसी भी अभियान के लिए ब्रिटेन के हवाई ठिकानों के उपयोग की अनुमति नहीं देंगे। विशेषज्ञ इसे केवल रक्षात्मक कदम नहीं, बल्कि स्टार्मर की घरेलू छवि और राजनीतिक अस्तित्व से जोड़कर देख रहे हैं। स्टार्मर की छवि एक उदारवादी और ‘प्रो-मुस्लिम’ नेता की रही है, जो

ट्रंप की दक्षिणपंथी विचारधारा के बिल्कुल विपरीत हैं। वे जानते हैंईरान हमले पर कीर स्टार्मर का ट्रंप को इनकार कि ट्रंप की ‘एकतरफा’ युद्ध नीति का समर्थन करना उनके अपने मतदाता आधार (विशेषकर प्रवासियों और फिलिस्तीन समर्थकों) को नाराज कर सकता है। यह ‘राष्ट्रीय अस्मिता’ की वह लड़ाई है जहाँ ब्रिटेन अब अमेरिका का ‘जूनियर पार्टनर’ बनकर रहने को तैयार नहीं है।

डिएगो गार्सिया और RAF फेयरफोर्ड—अमेरिका की सामरिक विवशता

डिएगो गार्सिया और RAF फेयरफोर्ड—अमेरिका की सामरिक विवशताडोनाल्ड ट्रंप की नजरें हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया (Diego Garcia) और इंग्लिश चैनल के पास स्थित RAF फेयरफोर्ड (RAF Fairford) एयरफील्ड पर टिकी हैं। अमेरिका के लिए डिएगो गार्सिया एक ‘सामरिक विवशता’ (Strategic Necessity) बन गया है क्योंकि यूएई, सऊदी अरब, कतर और कुवैत

जैसे खाड़ी देशों ने ईरान के डर से अपने बेस देने से मना कर दिया है।ईरान हमले पर कीर स्टार्मर का ट्रंप को इनकार तेहरान से डिएगो गार्सिया की दूरी मात्र 3800-3900 किलोमीटर है,ईरान हमले पर कीर स्टार्मर का ट्रंप को इनकार जो इसे हमलों के लिए सबसे सटीक ठिकाना बनाती है। हालांकि बी-2 जैसे बमवर्षक अमेरिका से भी उड़ान भर सकते हैं, लेकिन युद्धक अभियानों की निरंतरता के लिए इन ब्रिटिश बेस का न मिलना ट्रंप के लिए एक बहुत बड़ा सैन्य झटका है।

अपमान का कूटनीतिक हिसाब और टूटता भरोसा

अपमान का कूटनीतिक हिसाब और टूटता भरोसागठबंधन में आई इस खटास के पीछे ट्रंप की पिछली अपमानजनक बयानबाजी का बड़ा हाथ है। अफगानिस्तान युद्ध में ब्रिटिश सैनिकों के योगदान का मजाक उड़ाना हो, प्रिंस हैरी से जुड़े विवाद हों, या ग्रीनलैंड के मुद्दे पर पूरे यूरोप को किनारे कर देना—ट्रंप के ‘अमेरिका फर्स्ट’ रवैये ने सहयोगियों में असुरक्षा भर दी है। हाल ही में अमेरिकी सीनेटर मार्को रूबियो का यह कहना कि “अमेरिकी ही यूरोप के बच्चे हैं,” इस दूरी को कम करने के बजाय और बढ़ाता है। जब ट्रंप ने चागोस

द्वीप समझौते को लेकर ब्रिटेन के नेतृत्व पर सवाल उठाए, तो संबंधों की कड़वाहट सतह पर आ गई।”ब्रिटेन ‘स्टूपिड’ (Stupid) है।” — डोनाल्ड ट्रंप ने चागोस द्वीप और मॉरीशस के बीच चल रही बातचीत के संदर्भ में यह अपमानजनक टिप्पणी की थी।

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चागोस विवाद—1814 से 2025 तक का पेचीदा सफर

चागोस विवाद—1814 से 2025 तक का पेचीदा सफरडिएगो गार्सिया का विवाद इतिहास की गहराइयों में है। 1814 में नेपोलियन को हराने के बाद ब्रिटेन ने इस पर नियंत्रण प्राप्त किया था। 1968 में जब मॉरीशस को आजादी मिली, तो ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समूह को अपने पास ही रख लिया। इसे भारतीय संदर्भ में ऐसे समझा जा सकता है जैसे “भारत को आजादी तो मिल जाए, लेकिन ब्रिटेन

अंडमान-निकोबार या लक्षद्वीप को अपने पास ही रख ले।” बाद में ब्रिटेन ने इसे अमेरिका को सैन्य अड्डे के लिए दे दिया। अब 2025 में ब्रिटेन इसे मॉरीशस को लौटाने और बदले में 100 साल की ‘लीज’ लेने की तैयारी में है। ट्रंप को डर है कि इस समझौते से अमेरिका का रणनीतिक नियंत्रण कमजोर होगा, और यही तनाव की मुख्य जड़ है।

ईरान की रणनीति—अमेरिकी प्रभाव का अंत

ईरान की रणनीति—अमेरिकी प्रभाव का अंतईरान ने केवल जवाबी हमले की धमकी नहीं दी है, बल्कि उसकी रणनीति कहीं अधिक गहरी है। ईरान का लक्ष्य मध्य पूर्व से अमेरिका के प्रभाव को जड़ से मिटाना है। तेहरान ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि डिएगो गार्सिया का उपयोग हुआ, तो वह उसे सीधे निशाना बनाएगा। ईरान यह साबित करना चाहता है कि अमेरिका अब अपने सहयोगियों को सुरक्षा

देने में सक्षम नहीं है। इसी ‘प्रभावी निवारण‘ (Effective Deterrence) के कारण खाड़ी देश पीछे हटे हैं, और अब ब्रिटेन भी इसी ‘डोमिनो इफेक्ट’ की चपेट में है। ईरान का बढ़ता लचीलापन (Resilience) अमेरिका की क्षेत्रीय शक्ति के लिए सीधी चुनौती है।

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क्या अमेरिका अब अकेला पड़ रहा है?

क्या अमेरिका अब अकेला पड़ रहा है?यह घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक राजनीति की धुरी बदल रही है। नाटो का वह सदस्य जिसने अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका का साथ दिया, आज खुद को अलग कर रहा है। ट्रंप की ‘एकला चलो’ नीति ने अमेरिका को उसके सबसे पुराने मित्रों से भी दूर कर दिया है। यदि वाशिंगटन ने अपनी विदेश नीति और सहयोगियों के प्रति अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार नहीं किया, तो डिएगो गार्सिया का यह विवाद केवल एक शुरुआत होगी।एक विचारोत्तेजक प्रश्न: क्या ट्रंप का अहंकार और उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति दुनिया के सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन के पतन का कारण बनेगी?

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