डूरंड लाइन संघर्ष आज दक्षिण एशिया की भू-राजनीति का सबसे विस्फोटक मुद्दा बन चुका है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच खींची गई यह सीमा रेखा, जिसे डूरंड लाइन कहा जाता है, लंबे समय से विवाद का केंद्र रही है।
कभी पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में ‘रणनीतिक गहराई’ (Strategic Depth) की नीति अपनाते हुए वहां के सशस्त्र गुटों को अपने हितों के अनुरूप इस्तेमाल किया। लेकिन आज हालात ऐसे मोड़ पर पहुंच चुके हैं कि वही नीति उसके लिए आत्मघाती साबित होती दिख रही है।
सीमा पर बढ़ती गोलाबारी, चौकियों पर हमले, और तीखे राजनीतिक बयान इस बात के संकेत हैं कि यह केवल सीमित झड़प नहीं, बल्कि व्यापक रणनीतिक टकराव का रूप ले सकता है।

डूरंड लाइन का ऐतिहासिक विवाद
1893 में ब्रिटिश भारत और अफगान अमीर के बीच खींची गई यह रेखा आज भी विवादित है। अफगानिस्तान ने कभी भी इसे औपचारिक अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में पूर्ण स्वीकृति नहीं दी। यही कारण है कि पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा विवाद समय-समय पर हिंसक झड़पों में बदलता रहा है।अफगानिस्तान की सत्ता में जब तालिबान की वापसी हुई, तब पाकिस्तान को उम्मीद थी कि संबंध बेहतर होंगे। लेकिन इसके विपरीत, सीमा तनाव और अधिक बढ़ गया
‘प्रॉक्सी वॉर’ का नैरेटिव और ख्वाजा आसिफ का बयान
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हालिया संघर्ष को बाहरी ताकतों की ‘प्रॉक्सी वॉर’ करार दिया। उनका आरोप है कि अफगानिस्तान में सक्रिय तत्व पाकिस्तान को अस्थिर करने के लिए काम कर रहे हैं।
हालाँकि विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से ध्यान हटाने की रणनीति हो सकता है। डूरंड लाइन संघर्ष को केवल बाहरी साजिश बताना जमीनी वास्तविकताओं को नजरअंदाज करना होगा।
पाकिस्तान दशकों तक विभिन्न सशस्त्र गुटों को समर्थन देने के आरोपों से घिरा रहा है। अब वही गुट स्वतंत्र एजेंडा के साथ सक्रिय दिखाई दे रहे हैं।

न्यूक्लियर डिटरेंस बनाम असममित युद्ध
पाकिस्तान स्वयं को परमाणु शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। उसकी सैन्य नीति में ‘न्यूक्लियर डिटरेंस’ एक प्रमुख स्तंभ है। लेकिन सीमा पार से हो रहे हमले पारंपरिक युद्ध की श्रेणी में नहीं आते।डूरंड लाइन संघर्ष का एक बड़ा पहलू यह है कि यहां पारंपरिक सेना बनाम असममित लड़ाकों की स्थिति बनती जा रही है। आत्मघाती हमले, एंबुश, और गुरिल्ला रणनीति जैसे तरीके परमाणु शक्ति की उपयोगिता को सीमित कर देते हैं।यह वही मॉडल है जो पहले सोवियत संघ और बाद में अमेरिका के खिलाफ अफगानिस्तान में देखा गया।
15 घंटे, 15 चौकियां, 55 सैनिक: बढ़ती सैन्य चुनौती
हालिया रिपोर्टों के अनुसार सीमा पर तीव्र झड़पों में कई सैन्य चौकियों को निशाना बनाया गया। 15 घंटे के भीतर 15 पोस्टों पर हमले और दर्जनों सैनिकों के हताहत होने के दावे सामने आए।हालाँकि स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि डूरंड लाइन संघर्ष अब सीमित गोलीबारी से आगे बढ़ चुका है।रात के अंधेरे में एंबुशमोर्टार और भारी हथियारों का इस्तेमालसीमा पार से तेज़ जवाबी कार्रवाईये सभी संकेत देते हैं कि संघर्ष का स्तर ऊँचा हो चुका है।
साम्राज्यों की कब्रगाह: क्या दोहराएगा इतिहास?
अफगानिस्तान को लंबे समय से ‘साम्राज्यों की कब्रगाह’ कहा जाता है। सोवियत संघ के विघटन और अमेरिकी वापसी के बाद यह उपमा और प्रचलित हुई।अमेरिका ने 2021 में अफगानिस्तान से वापसी की, जिसके दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों पर भी व्यापक चर्चा हुई थी।अब सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान भी उसी ऐतिहासिक जाल में फंस रहा है?डूरंड लाइन संघर्ष यह संकेत देता है कि अफगान भूगोल और वहां की जमीनी राजनीति को नजरअंदाज करना किसी भी देश के लिए महंगा साबित हो सकता है।
पाकिस्तान की आंतरिक चुनौती
पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और आतंकी हमलों से जूझ रहा है। ऐसे में सीमा पर खुला संघर्ष उसकी सैन्य और आर्थिक क्षमता पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।रक्षा बजट में वृद्धिअंतरराष्ट्रीय दबावआंतरिक असंतोषये सभी कारक मिलकर स्थिति को और जटिल बना सकते हैं।

क्षेत्रीय प्रभाव: दक्षिण एशिया की बदलती तस्वीर
डूरंड लाइन संघर्ष केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं है। इसका प्रभाव पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ सकता है।चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) की सुरक्षामध्य एशिया से व्यापार मार्गआतंकवाद-रोधी सहयोगयदि सीमा अस्थिर रहती है, तो क्षेत्रीय परियोजनाओं और कूटनीतिक समीकरणों पर भी असर पड़ेगा
कूटनीतिक समाधान ही विकल्प
इतिहास यह बताता है कि सीमा विवादों का समाधान केवल सैन्य कार्रवाई से संभव नहीं होता। संवाद, विश्वास निर्माण और सीमा प्रबंधन तंत्र को मजबूत करना अनिवार्य है।पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों के लिए यह आवश्यक है कि वे सीमा पर संयुक्त निगरानी, खुफिया साझेदारी और राजनीतिक संवाद को प्राथमिकता दें।डूरंड लाइन संघर्ष का दीर्घकालिक समाधान तभी संभव है जब दोनों देश ऐतिहासिक विवादों को कूटनीतिक ढंग से
क्या बदलेगी रणनीति?
आज स्थिति एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। पाकिस्तान को यह तय करना होगा कि वह ‘रणनीतिक गहराई’ की पुरानी नीति पर कायम रहेगा या क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में नया रास्ता चुनेगा।डूरंड लाइन संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रॉक्सी रणनीतियाँ अंततः उल्टा वार कर सकती हैं।भविष्य की राह सैन्य शक्ति प्रदर्शन में नहीं, बल्कि समझदारी, संतुलन और स्थायी कूटनीतिक प्रयासों में छिपी है।