बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद का बड़ा खुलासा: मोहम्मद यूनुस के वो 5 सच जो आपको चौंका देंगे

बांग्लादेश में तख्तापलट

बांग्लादेश में तख्तापलट और ‘नोबेल’ छवि के पीछे का सचबांग्लादेश में तख्तापलट ने दक्षिण एशिया की राजनीति को हिला कर रख दिया है। जिस राजनीतिक उथल-पुथल को कुछ लोगों ने लोकतांत्रिक पुनर्जागरण बताया, वही अब गंभीर संवैधानिक सवालों के घेरे में है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में रहे हैं नोबेल पुरस्कार विजेता Muhammad Yunus।एक समय वैश्विक मंचों पर शांति और

सामाजिक उद्यमिता के प्रतीक माने जाने वाले यूनुस पर अब ऐसे आरोप लग रहे हैं, जो उनकी छवि से बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश करते हैं। क्या बांग्लादेश में तख्तापलट जनता की इच्छा का परिणाम था या सत्ता की रणनीतिक चाल? क्या संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन हुआ या संस्थाओं को दरकिनार किया गया? आइए जानते हैं वे 5 बड़े खुलासे जो इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए बेहद अहम हैं।

राष्ट्रपति को ‘बंधक’ बनाने का आरोप: बांग्लादेश में तख्तापलट का सबसे गंभीर दावा

बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद सबसे सनसनीखेज आरोप देश के राष्ट्रपति Mohammed Shahabuddin की ओर से सामने आया। राष्ट्रपति ने संकेत दिया कि सत्ता परिवर्तन के दौरान उन्हें प्रभावी रूप से अलग-थलग कर दिया गया था।मुख्य आरोप इस प्रकार हैं:उन्हें ‘बंगभवन’ के भीतर सीमित कर दिया गयाबाहरी दुनिया से संपर्क लगभग काट दिया गयामहत्वपूर्ण संवैधानिक निर्णयों की

जानकारी उनसे साझा नहीं की गईविदेश से आए आधिकारिक निमंत्रणों को रोक दिया गयाराष्ट्रपति का यह भी दावा है कि उन्हें संभावित शारीरिक खतरे का अंदेशा था। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह केवल राजनीतिक मतभेद नहीं बल्कि संवैधानिक ढांचे पर सीधा हमला माना जाएगा।बांग्लादेश में तख्तापलट की वैधता पर यही सवाल सबसे बड़ा है—क्या लोकतंत्र में राष्ट्रपति जैसी संवैधानिक संस्था को दरकिनार कर सत्ता चलाई जा सकती है?

बांग्लादेश में तख्तापलट

अमेरिका के साथ सैन्य समझौते: क्या बांग्लादेश में तख्तापलट के पीछे भू-राजनीति थी?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश में तख्तापलट को केवल आंतरिक सत्ता संघर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसमें अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हित भी शामिल हो सकते हैं।सूत्रों के अनुसार, यूनुस प्रशासन ने अमेरिका के साथ दो महत्वपूर्ण सैन्य समझौतों पर चर्चा तेज कर दी थी:GSOMIA (General Security of Military Information Agreement)ACSA (Acquisition and Cross-Servicing Agreement)इन समझौतों का उद्देश्य सैन्य सहयोग

और खुफिया जानकारी साझा करना बताया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina ने कथित रूप से इन समझौतों को राष्ट्रीय संप्रभुता के आधार पर आगे नहीं बढ़ाया था।यदि बांग्लादेश में तख्तापलट के दौरान इन समझौतों को प्राथमिकता दी गई, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सत्ता परिवर्तन का संबंध अंतरराष्ट्रीय दबाव या रणनीतिक समीकरणों से था?दक्षिण एशिया पहले से ही अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा का केंद्र है। ऐसे में बांग्लादेश की रणनीतिक स्थिति—बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और भारत-म्यांमार सीमा के पास—उसे और अधिक महत्वपूर्ण बना देती है।

जुलाई चार्टर’ और संवैधानिक संशोधन: सत्ता विस्तार की कोशिश?

बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद यूनुस के कथित ‘जुलाई चार्टर’ ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी। आरोप है कि इस चार्टर के माध्यम से राष्ट्रपति पद को अधिक शक्तिशाली बनाने और जनमत संग्रह के जरिए संवैधानिक बदलाव का रास्ता तैयार किया जा रहा था।लेकिन यहाँ राजनीतिक चुनौती सामने आई Tarique Rahman और उनकी पार्टी Bangladesh Nationalist Party (BNP) की ओर से।BNP की रणनीति:केवल सांसद पद की शपथ लेनासंविधान संशोधन की शपथ से इनकारकानूनी रूप से गठित संविधान सभा की मांगइस रणनीतिक कदम ने यूनुस की संभावित शक्ति विस्तार योजना को रोक दिया। यही वह मोड़ था जिसने बांग्लादेश में तख्तापलट की दिशा को निर्णायक रूप से बदल दिया।

बांग्लादेश में तख्तापलट

सेना का अल्टीमेटम: असली शक्ति संतुलन कहाँ था?

दक्षिण एशियाई राजनीति में सेना की भूमिका अक्सर निर्णायक रही है, और बांग्लादेश में तख्तापलट भी इससे अछूता नहीं रहा। सूत्रों के मुताबिक, सेना पिछले कई महीनों से चुनाव कराने को लेकर दबाव बना रही थी।सेना के भीतर नेतृत्व परिवर्तन भी हुआ:लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद मैनुर रहमान – चीफ ऑफ जनरल स्टाफलेफ्टिनेंट जनरल मीर मुशफिक उर रहमान – प्रिंसिपल स्टाफ ऑफिसरइन नियुक्तियों को सत्ता संतुलन के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि सेना ने स्पष्ट कर दिया था कि वह अनिश्चितकालीन अस्थायी शासन या बिना जनादेश की सरकार को स्वीकार नहीं करेगी।इस दृष्टिकोण से देखें तो बांग्लादेश में तख्तापलट केवल राजनीतिक टकराव नहीं बल्कि संस्थागत शक्ति संघर्ष भी था।

सत्ता से वापसी: मोहम्मद यूनुस की छवि पर असर

एक समय वैश्विक मंचों पर सम्मानित चेहरे रहे Muhammad Yunus अब कथित रूप से सक्रिय राजनीति से दूरी बनाकर अपने सामाजिक कार्यों की ओर लौट चुके हैं।बांग्लादेश में तख्तापलट ने उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर विराम लगा दिया है। अंतरराष्ट्रीय समर्थन और सोशल मीडिया लोकप्रियता के बावजूद, घरेलू राजनीतिक समर्थन की कमी उनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई।उनकी विदाई ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल वैश्विक प्रतिष्ठा किसी देश की जटिल राजनीतिक संरचना को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं होती।

बांग्लादेश में तख्तापलट

बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद भविष्य की दिशा

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