भारत में BRICS की हलचल: क्या अमेरिका का ‘एकतरफा’ राज खत्म हो रहा है? 5 बड़े संकेत

भारत में BRICS की हलचल दुनिया की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ पुराने शक्ति संतुलन तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा है, वहीं दूसरी तरफ BRICS देशों का बढ़ता प्रभाव वैश्विक व्यवस्था को नई दिशा देने की कोशिश कर रहा है। भारत की राजधानी दिल्ली में हाल ही में हुई BRICS और सहयोगी देशों की कूटनीतिक बैठकों ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या अब दुनिया अमेरिकी प्रभुत्व से निकलकर एक “बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था” (Multipolar World Order) की ओर बढ़ रही है।

दिल्ली में रूस, ईरान, ब्राजील, चीन और कई अन्य देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी केवल एक सामान्य राजनयिक कार्यक्रम नहीं थी। यह एक ऐसा मंच बनता दिखाई दिया जहाँ डॉलर की ताकत, अमेरिकी प्रतिबंधों और पश्चिमी प्रभाव को चुनौती देने की रणनीति पर चर्चा हो रही थी। खास बात यह रही कि भारत ने भी इस मंच पर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और “ग्लोबल साउथ” के नेतृत्व की झलक दिखाई।

आइए समझते हैं वे 5 बड़े संकेत, जो बताते हैं कि BRICS अब केवल एक आर्थिक संगठन नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन बदलने वाला मंच बनता जा रहा है।

भारत में BRICS की हलचल

मिनाब 168’ – ईरान का अमेरिका को प्रतीकात्मक संदेश

दिल्ली पहुँचे ईरान के विदेश मंत्री का विमान “मिनाब 168” अचानक अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया। यह सिर्फ एक विमान का नाम नहीं था, बल्कि अमेरिका विरोधी प्रतीक के रूप में देखा गया। ईरान ने इस नाम के जरिए उन 168 लोगों की याद दिलाने की कोशिश की, जिन्हें वह अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों का शिकार मानता है।

इस कदम को कई विशेषज्ञ “कूटनीतिक संदेश” मान रहे हैं। ईरान यह दिखाना चाहता है कि वह अमेरिकी दबाव और प्रतिबंधों के बावजूद वैश्विक मंचों पर अपनी उपस्थिति मजबूत बनाए हुए है। भारत जैसे बड़े देश में इस तरह का संदेश देना यह भी दर्शाता है कि BRICS देशों के भीतर अमेरिका विरोधी भावनाएँ अब खुलकर सामने आने लगी हैं।

BRICS और De-dollarization से क्यों घबराया अमेरिका?

BRICS देशों का सबसे बड़ा एजेंडा इस समय “डीडॉलराइजेशन” यानी डॉलर पर निर्भरता कम करना माना जा रहा है। रूस और चीन लंबे समय से स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की बात कर रहे हैं। यही कारण है कि अमेरिका को डर है कि अगर BRICS देश कोई वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था बना लेते हैं, तो डॉलर का वैश्विक वर्चस्व कमजोर पड़ सकता है।

हाल के महीनों में BRICS करेंसी को लेकर सोशल मीडिया पर कई चर्चाएँ हुईं। रूस द्वारा साझा किए गए एक “मीम” को भी पश्चिमी देशों ने गंभीर संकेत के रूप में लिया। इसके बाद अमेरिका के राजनीतिक हलकों में चिंता बढ़ी और डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं ने BRICS देशों पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी तक दे डाली।

आज भी दुनिया के अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में होते हैं, लेकिन रूस-चीन, भारत-रूस और ईरान-चीन जैसे देशों के बीच स्थानीय मुद्रा में बढ़ता व्यापार इस बात का संकेत है कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था धीरे-धीरे बदल रही है।

भारत में BRICS की हलचल

क्या अमेरिका की शक्ति कमजोर पड़ रही है?

ईरान के विदेश मंत्री ने दिल्ली में दिए अपने बयान में अमेरिका को “जख्मी जानवर” जैसी उपमा देकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया। उनका कहना था कि अमेरिका अब एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम नहीं है और इसलिए वह उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बना रहा है।

हालांकि अमेरिका अब भी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक ताकत है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कई घटनाओं ने उसकी स्थिति को चुनौती दी है। अफगानिस्तान से वापसी, रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन का आर्थिक विस्तार और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता ने अमेरिकी प्रभाव को कमजोर किया है।

BRICS देशों का मानना है कि अब दुनिया केवल वॉशिंगटन के फैसलों से नहीं चलेगी। चीन, भारत और रूस जैसे देश अपनी-अपनी क्षेत्रीय ताकत को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना चाहते हैं। यही कारण है कि “Multipolar World” यानी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की चर्चा लगातार बढ़ रही है।

भारत का रुख – संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता

भारत इस पूरे समीकरण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। एक तरफ भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ BRICS, SCO और Global South जैसे मंचों पर रूस, चीन और ईरान के साथ भी संवाद बनाए हुए है।

दिल्ली की बैठक में भारत ने “एकतरफा प्रतिबंधों” का विरोध करते हुए साफ संकेत दिया कि वह किसी भी देश के आर्थिक दबाव की राजनीति का समर्थन नहीं करता। भारत का मानना है कि वैश्विक नियम संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय सहमति के आधार पर तय होने चाहिए, न कि किसी एक देश की इच्छा से।

विशेषज्ञों के अनुसार भारत खुद को “ब्रिज नेशन” के रूप में स्थापित कर रहा है — यानी पश्चिम और पूर्व के बीच संतुलन बनाने वाला देश। यही वजह है कि भारत आज अमेरिका, रूस, यूरोप और मध्य-पूर्व सभी के साथ मजबूत संबंध बनाए हुए है।

भारत में BRICS की हलचल

हॉर्मुज का तनाव और वैश्विक व्यापार पर खतरा

BRICS बैठक के दौरान समुद्री सुरक्षा का मुद्दा भी चर्चा में रहा। ईरान ने दावा किया कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पूरी तरह सुरक्षित है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को कोई खतरा नहीं है। लेकिन इसी बीच भारतीय जहाज “हाजी अली” पर हुए कथित ड्रोन हमले ने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए।

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग माना जाता है। यहाँ से गुजरने वाले जहाज वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद जरूरी हैं। यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतें और वैश्विक व्यापार दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

भारत जैसे देश, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति चिंता का विषय है। इसलिए भारत एक तरफ ईरान के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ समुद्री सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता पर भी जोर दे रहा है।

क्या दुनिया नए World Order की ओर बढ़ रही है?

BRICS अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे एक ऐसे मंच के रूप में उभर रहा है, जो अमेरिकी प्रभुत्व वाली व्यवस्था को चुनौती देना चाहता है। डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश, वैकल्पिक व्यापार प्रणाली, और पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ आवाज — ये सभी संकेत बताते हैं कि दुनिया में शक्ति संतुलन बदल रहा है।

हालांकि अमेरिका अभी भी बेहद शक्तिशाली है, लेकिन चीन, भारत, रूस और अन्य देशों का बढ़ता प्रभाव यह दिखाता है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति अधिक जटिल और बहुध्रुवीय हो सकती है।

भारत इस बदलाव के केंद्र में खड़ा दिखाई देता है। आने वाले BRICS शिखर सम्मेलन और वैश्विक घटनाएँ तय करेंगी कि क्या वास्तव में अमेरिकी “एकतरफा राज” का अंत शुरू हो चुका है, या फिर यह केवल बदलती कूटनीति का एक नया दौर है।